SPECIAL STORY: जब सुखदेव ने मां से कहा था- घोड़ी पर चढ़ने के बदले फांसी पर चढ़ूंगा

New Delhi: कर चले हम फिदा, जान-ओ-तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो…. जब भी स्वतंत्रता सेनानियों की बात होती है तो Bhagat Singh, Sukhdev और Rajguru का नाम लिया जाता है। 15 मई को स्वंतत्रता सेनानी सुखदेव की जयंती है।

भारत को आजादी दिलाने के लिए कई सूरवीरों ने अपनी जान कुर्बान कर दी। ऐसे ही देशभक्त शहीदों में से एक थे, सुखदेव थापर, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत को अंग्रेजों की बेंड़ियों से मुक्त कराने के लिये समर्पित कर दिया। सुखदेव महान क्रान्तिकारी भगत सिंह के बचपन के दोस्त थे। दोनों साथ बड़े हुये, साथ में पढ़े और अपने देश को आजाद कराने की जंग में एक साथ भारत मां के लिये शहीद हो गये।

15 मई 1907 को जन्में सुखदेव का पूरा नाम Sukhdev Thapar था। उन्हें Bhagat Singh और Rajguru के साथ 23 मार्च 1931 को फांसी पर लटका दिया गया था। इनकी शहादत को आज भी भारत में सम्मान से देखा जाता है। सुखदेव भगत सिंह की तरह बचपन से ही आजादी का सपना लिए हुए थे। दोनों ‘लाहौर नेशनल कॉलेज’ के स्टूडेंट थे। दोनों एक ही साथ पैदा हुए और एक ही साथ शहीद हुए। मकदस भी एक ही था। देश की आजादी।

 

सुखदेव के जन्म के साथ ही पिता का निधन हो गया। मां ने ही सुखदेव की परवरिश की थी। सुखदेव की मां जब कहती थी कि सुखदेव मैं तुम्हारी शादी करूंगी तो घोड़ी पर चढ़ेगा, तब सुखदेव हमेशा एक ही बात कहते थे, घोड़ी पर चढ़ने के बदले फांसी पर चढ़ूंगा। सुखदेव के पिता का नाम रामलाल और माता का नाम राल्ली देवी था।

किशोरावस्था से ही सुखदेव ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों से परिचित थे। उस समय ब्रिटिश भारतीय लोगों के साथ गुलाम की तरह व्यवहार करते थे। हर एक भारतीय को घृणा की नजर से देखते थे। यही वजह है कि सुखदेव ने देश को आजादी दिलाने की ठान ली थी।

सुखदेव ने दूसरे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर नौजवान भारत सभा की स्थापना भारत में की। इस संस्था ने बहुत से क्रांतिकारी आंदोलनों में भाग लिया था और आजeदी के लिये संघर्ष भी किया था। सुखदेव ने बहुत से क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लिया। 1929 का जेल भरो आंदोलन। इसके साथ-साथ वे भारतीय स्वतंत्रता अभियान के भी सक्रीय सदस्य थे।

दिल्ली में सेंट्रल असेंबली हॉल में बमबारी करने के बाद सुखदेव और उनके दोस्तों को पुलिस ने पकड़ लिया था। उन्हें मौत की सजा सुनाई गयी थी। शवो को रहस्यमयी तरीके से सतलज नदी के किनारे पर जलाया गया था। सुखदेव ने अपने जीवन को देश के लिये न्योछावर कर दिया था और सिर्फ 24 साल की उम्र में वे शहीद हो गए थे। 23 मार्च 1931 की शाम 7 बजकर 33 मिनट पर सेंट्रल जेल में इन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया और खुली आंखों से भारत की आजादी का सपना देखने वाले ये तीन दिवाने हमेशा के लिये सो गये।

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